विस्तृत उत्तर
कलियुग में शास्त्रों का सार इसलिए जरूरी बताया गया है कि मनुष्य की शक्ति और स्थिति कमजोर है। लोग अल्पायु हैं, साधना में उनकी रुचि कम है, वे आलसी, मंदबुद्धि, मंदभाग्य और अनेक बाधाओं से घिरे हुए हैं। दूसरी ओर शास्त्र बहुत हैं। उनमें एक निश्चित साधन का नहीं, अनेक प्रकार के कर्मों का वर्णन है। वे इतने बड़े हैं कि उनका एक अंश सुनना भी कठिन है। इसलिए ऋषि सूतजी से कहते हैं कि आप परोपकारी हैं; अपनी बुद्धि से उन शास्त्रों का सार निकालकर श्रद्धालु श्रोताओं को सुनाइए, जिससे प्राणियों का परम कल्याण हो और अंतःकरण की शुद्धि प्राप्त हो। यहाँ शास्त्र-सार की आवश्यकता करुणा और व्यावहारिकता दोनों से जुड़ी है।
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