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विस्तृत उत्तर
मेरु पर्वत की उत्पत्ति स्वर्ण अंड के गर्भावरण से बताई गई है। विष्णु ब्रह्मा को सृष्टि क्रम समझाते हैं कि महादेव से उत्पन्न बीज सागररूप योनि में स्वर्ण अंड बन गया। वह अंड एक हजार वर्ष जल में रहा और फिर वायु के द्वारा दो भागों में विभक्त हुआ। एक खंड से आकाश और दूसरे से पृथ्वी बनी। उसी क्रम में कहा गया है कि जो अति उन्नत स्वर्णपर्वत मेरु है, वह उस अंड के गर्भावरण से निर्मित हुआ।
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शास्त्रीय स्रोत
श्रीलिङ्गमहापुराण, पूर्वभाग, अध्याय 20, PDF पृष्ठ 95, श्लोक 80-81
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