विस्तृत उत्तर
स्वर्ण अंड से सृष्टि का क्रम लिंगरूप प्रणव से जोड़ा गया है। परमेश्वर शिव के लिंग से अकाररूप बीज, उकाररूप योनि में गिरकर चारों ओर वृद्धि को प्राप्त हुआ और वह स्वर्ण अंड बन गया। वह दिव्य अंड एकाक्षर प्रणव से आदि-अन्त में आवेष्टित होकर बहुत वर्षों तक जल में स्थित रहा। हजार वर्षों के बाद आदिरूप परमेश्वर ने उस अजोद्भूत अंड को दो भागों में कर दिया। इसी अंड से आगे आकाश, पृथ्वी और चतुर्मुख ब्रह्मा की उत्पत्ति बताई गई है।
आगे क्या पढ़ें
प्रश्न से जुड़े हब और आज के उपयोगी पंचांग लिंक





