विस्तृत उत्तर
आकाश और पृथ्वी की उत्पत्ति स्वर्ण अंड के विभाजन से बताई गई है। जल में स्थित अजोद्भूत स्वर्ण अंड को साक्षात् आदिरूप परमेश्वर ने हजार वर्षों के बाद दो भागों में कर दिया। उस अंड के ऊपर स्थित हेममय पवित्र कपाल से आकाश उत्पन्न हुआ और नीचे के भाग से पाँच लक्षणों से सम्पन्न पृथ्वी की उत्पत्ति हुई। उसी अंड से अकारसंज्ञक चतुर्मुख ब्रह्मा भी प्रकट हुए। इसीलिए लिंगरूप प्रणव को सभी लोकों की सृष्टि करने वाला कहा गया है।
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