विस्तृत उत्तर
आकाश और पृथ्वी स्वर्ण अंड के विभाजन से बने बताए गए हैं। स्वर्ण अंड एक हजार वर्षों तक जल में स्थित रहा। उस अवधि के अंत में वायु के द्वारा वह दो भागों में विभक्त हो गया। उसके एक खंड से आकाश और दूसरे खंड से पृथ्वी का प्रादुर्भाव हुआ। उसी वर्णन में यह भी कहा गया है कि अति उन्नत स्वर्णपर्वत मेरु उस अंड के गर्भावरण से बना। इस प्रकार आकाश, पृथ्वी और मेरु की उत्पत्ति स्वर्ण अंड से जोड़ी गई है।
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