विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद जीवात्मा की यात्रा का विस्तार से वर्णन है। जब किसी की मृत्यु होती है, तो यमराज के दूत आत्मा को लेकर यमलोक जाते हैं। वहाँ चित्रगुप्त के पास उस जीव के समस्त कर्मों का लेखा-जोखा होता है और यमराज उसके अनुसार न्याय करते हैं।
न्याय के पश्चात जीवात्मा को तीन में से एक गति मिलती है — यदि पुण्य अधिक हो तो स्वर्गलोक, यदि पाप अधिक हो तो विभिन्न नरकों में यातना, और यदि मोक्ष के योग्य हो तो सीधे परमधाम। जिनके पुण्य-पाप समान हों या जो पुनर्जन्म के लिए उचित हों, वे मृत्युलोक में वापस आते हैं।
गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि मृत्यु के बाद जीवात्मा कुछ समय (13 दिन तक) अपने परिजनों के पास ही रहती है — वह उन्हें देख सकती है, पर वे उसे नहीं देख सकते। इसीलिए हिंदू परंपरा में 13 दिन तक पिंडदान और तेरहवीं का विधान है ताकि आत्मा को आगे की यात्रा की शक्ति मिले।
मृत्युलोक से यमलोक की यात्रा कठिन बताई गई है — बीच में वैतरणी नदी पार करनी होती है। जिन्होंने जीवन में दान-पुण्य किए हों, वे सुगमता से पार हो जाते हैं।





