विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्राण-निर्गमन का बहुत विस्तृत वर्णन मिलता है। शास्त्र के अनुसार शरीर के नौ द्वार होते हैं — दोनों आँखें, दोनों कान, दोनों नासिकाएँ, मुख और दो उत्सर्जन अंग। इन्हीं में से किसी एक द्वार से आत्मा शरीर का त्याग करती है, और यह कौन से द्वार से होगा, यह व्यक्ति के कर्म और स्वभाव पर निर्भर करता है।
गरुड़ पुराण के अनुसार: जो व्यक्ति जीवन भर धर्म के मार्ग पर चला हो, उसके प्राण नासिका से निकलते हैं — जो अत्यंत शुभ माना जाता है। जो व्यक्ति धर्मनिष्ठ हो, उसके प्राण मुख से निकलते हैं। जो व्यक्ति मोहग्रस्त हो, उसके प्राण आँखों से निकलते हैं — इसीलिए आँखें खुली रह जाती हैं। जो व्यक्ति स्वार्थी, विषयासक्त और पापी हो, उसके प्राण उत्सर्जन अंगों से निकलते हैं — जो अत्यंत अशुभ माना जाता है। महात्माओं और ऊँचे साधकों के प्राण ब्रह्मरंध्र (सिर के शीर्ष) से निकलते हैं जिससे उन्हें मोक्ष प्राप्त होता है।
इस प्रकार प्राण-निर्गमन जीवन का अंतिम प्रमाण है — किस मार्ग से प्राण निकले, यह बताता है कि व्यक्ति ने जीवन किस प्रकार जिया।





