विस्तृत उत्तर
सनातन शास्त्रों के अनुसार शरीर की शक्ति का मूल आधार पाँच प्राण हैं जो समस्त इंद्रियों, अंगों और मन को ऊर्जा प्रदान करते हैं। जब मृत्यु का समय आता है, तो जीवात्मा शरीर से अपना संबंध तोड़ने लगती है — और इसी प्रक्रिया में प्राण-ऊर्जा धीरे-धीरे विभिन्न अंगों से हटती जाती है।
गरुड़ पुराण में वर्णित है कि सबसे पहले वाणी-शक्ति जाती है, फिर हाथ-पैरों की शक्ति क्षीण होती है, देखने-सुनने की क्षमता कम होती है और अंततः समस्त इंद्रियाँ शिथिल पड़ जाती हैं। यह क्रमिक प्रक्रिया है।
वेदांत में इसे इस प्रकार समझाया गया है — जैसे एक दीपक में तेल समाप्त होने पर पहले उसकी लौ छोटी होती है, फिर और कम होती है और अंत में बुझ जाती है — उसी प्रकार जीवात्मा के प्रस्थान के साथ शरीर की शक्ति क्रमशः क्षीण होती जाती है।
यह किसी बीमारी का परिणाम नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और प्राकृतिक प्रक्रिया है। जीवात्मा के बिना यह पाँच तत्वों का शरीर निर्जीव है — उसमें शक्ति जीवात्मा की उपस्थिति से थी, उसके जाने से स्वाभाविक रूप से शक्ति समाप्त हो जाती है।





