विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में मृत्यु के समय होने वाले शारीरिक और चेतन परिवर्तनों का विस्तार से वर्णन किया गया है। जब मृत्यु का समय निकट आता है, तो सबसे पहले बोलने की शक्ति चली जाती है। व्यक्ति चाहते हुए भी कुछ बोल नहीं पाता। इसके पश्चात सुनने, देखने और अनुभव करने की शक्ति भी क्रमशः क्षीण होने लगती है।
गरुड़ पुराण के अनुसार इस अवस्था में व्यक्ति को 'दिव्य दृष्टि' मिलती है — वह अपने संपूर्ण जीवन को एक क्षण में देखने लगता है। उसके अच्छे-बुरे कर्म उसके सामने प्रकट होते हैं। जो पापकर्मी हैं, उन्हें यमदूत दिखाई देते हैं और भय से उनका शरीर काँप उठता है।
शास्त्रों में वर्णित है कि प्राण-निर्गमन की पीड़ा अत्यंत तीव्र हो सकती है — विशेषकर उनके लिए जो मोह-माया में लिप्त रहे हों। जो व्यक्ति जीवन भर ईश्वर का स्मरण करते रहे हों, उन्हें यह पीड़ा बहुत कम होती है और उनकी मृत्यु सहज होती है।
शरीर के नौ द्वारों — दोनों आँखें, दोनों कान, दोनों नासिकाएँ, मुख और दो उत्सर्जन अंगों — में से किसी एक से आत्मा निर्गत होती है। कौन से द्वार से आत्मा निकलती है, यह व्यक्ति के जीवन और कर्मों पर निर्भर करता है।





