विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में मृत्यु के समय होने वाली पीड़ा का विस्तृत वर्णन मिलता है। पुराण के अनुसार प्राण-निर्गमन की पीड़ा अत्यंत तीव्र होती है — इसे सौ बिच्छुओं के एक साथ डंक मारने जैसी पीड़ा के समान बताया गया है। गला सूख जाता है, शरीर में बेचैनी होती है और व्यक्ति हाय-हाय करता हुआ शरीर से बाहर निकलता है।
हालाँकि यह पीड़ा व्यक्ति के कर्मों और जीवन पर निर्भर करती है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि जिसने जीवन भर भगवान का स्मरण किया हो, धर्म के मार्ग पर चला हो, उसे मृत्यु के समय बहुत कम पीड़ा होती है। उसके प्राण सहजता से निकलते हैं। ऐसी आत्मा को लेने के लिए यमदूत नहीं, बल्कि दिव्य विमान और देवदूत आते हैं।
इसके विपरीत, जो व्यक्ति पापकर्मों में डूबा रहा हो, जिसने जीवन भर ईश्वर का विस्मरण किया हो, उसके लिए मृत्यु अत्यंत कष्टकारी होती है। भय, शारीरिक यातना और मानसिक व्याकुलता — सब एक साथ होती हैं। यमदूत उसे बलपूर्वक गले में पाश डालकर खींचते हैं।
इसीलिए शास्त्र कहते हैं — जीवन भर ईश्वर-स्मरण ही मृत्यु को सहज बनाता है।





