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जीवन एवं मृत्यु⏱ 2 मिनट पठन

मृत्यु को अवश्यंभावी क्यों कहा गया है?

भगवद्गीता के अनुसार 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः' — जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है।

संक्षिप्त उत्तर

भगवद्गीता के अनुसार 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः' — जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है। शरीर पाँच नश्वर तत्वों से बना है और वापस उन्हीं में विलीन होता है। यह प्रकृति का अटल नियम है, दंड नहीं।

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विस्तृत उत्तर

सनातन शास्त्रों में मृत्यु को 'अवश्यंभावी' इसलिए कहा गया है क्योंकि यह सृष्टि के नियम का अटल सत्य है। भगवद्गीता में स्पष्ट कहा गया है — 'जातस्य हि ध्रुवो मृत्युः' — अर्थात् जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। यह नियम किसी के लिए भी अपवाद नहीं रखता — चाहे मनुष्य हो, देवता हो, पशु हो या पक्षी।

गरुड़ पुराण में भी यह बात दोहराई गई है कि स्थूल शरीर पाँच नश्वर तत्वों से निर्मित है। जिन तत्वों से शरीर बना है, मृत्यु के पश्चात वे उन्हीं तत्वों में वापस विलीन हो जाते हैं। इसीलिए स्थूल शरीर की मृत्यु अनिवार्य है — यह न कोई दुर्घटना है, न कोई दंड, बल्कि प्रकृति का स्वाभाविक नियम है।

कठोपनिषद में यमराज स्वयं नचिकेता को बताते हैं कि मृत्यु ही वह द्वार है जिसके पार जीवात्मा की वास्तविक यात्रा आरंभ होती है। मृत्यु का भय इसलिए है क्योंकि मनुष्य स्वयं को शरीर मानता है, आत्मा नहीं। जिस क्षण उसे यह ज्ञान हो जाता है कि वह अजर-अमर आत्मा है, मृत्यु का भय स्वतः समाप्त हो जाता है।

इस प्रकार मृत्यु अवश्यंभावी इसलिए है क्योंकि शरीर नश्वर है — किंतु यह अंत नहीं, बल्कि आत्मा के लिए एक नए अध्याय का आरंभ है।

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