विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण और सनातन शास्त्रों में पाप की परिभाषा बहुत गहरी और व्यापक है।
शाब्दिक अर्थ — 'पाप' वह कर्म है जो धर्म के विरुद्ध हो, दूसरों को कष्ट दे और स्वयं को भी अधःपतन की ओर ले जाए।
गरुड़ पुराण में — गरुड़ पुराण के चतुर्थ अध्याय का विषय ही 'नरक प्रदान करने वाले पाप कर्म' है। इसमें भगवान विष्णु गरुड़ को बताते हैं — 'किन पापों के कारण पापी मनुष्य यमलोक के महामार्ग में जाते हैं और किन पापों से वैतरणी में गिरते हैं तथा किन पापों के कारण नरक में जाते हैं?'
तीन प्रकार के पाप — मानसिक (बुरे विचार), वाचिक (झूठ, कटु वचन) और कायिक (शरीर से किए गए बुरे कर्म)। गरुड़ पुराण में 'श्रवण' देवता मनुष्य के इन तीनों प्रकार के शुभ-अशुभ कर्मों को जानते हैं।
पाप का परिणाम — 'मनुष्य के कर्म ही उसके भविष्य का निर्माण करते हैं।' पाप करने वाले को इस जन्म में और मृत्यु के बाद यमलोक में — दोनों जगह दंड भोगना पड़ता है।





