विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत को भूख लगने का कारण आत्मा के संस्कारों और वासनाओं से जुड़ा बताया गया है।
वासनामय शरीर — जब आत्मा शरीर त्यागती है, वह अपने साथ अपनी वासनाएँ और कामनाएँ लेकर जाती है। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'जब एक आत्मा शरीर को त्याग करती है, तो उसमें भूख, प्यास, क्रोध, वासना और द्वेष आदि का भाव आने लगता है।'
संचित इच्छाएँ — जो व्यक्ति जीवन भर भोग-विलास में रहा, जिसकी इच्छाएँ अधूरी रह गईं — उसकी आत्मा में भूख की वासना विशेष रूप से प्रबल होती है।
सूक्ष्म शरीर में भी संवेदनशीलता — प्रेत के सूक्ष्म वासनामय शरीर में स्थूल शरीर जैसी भूख की संवेदनशीलता होती है। यह शरीर की नहीं, संस्कारों की भूख है।
पिंडदान का महत्व — इसीलिए पिंडदान का विधान है — ताकि प्रेत की यह वासना-जनित भूख कुछ कम हो सके और वह यात्रा पर आगे बढ़ सके।
इस प्रकार प्रेत की भूख वास्तव में उसकी संचित वासनाओं और अतृप्त इच्छाओं का प्रकाशन है।





