विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में प्रेत के सूक्ष्म शरीर में रहने के कारण का स्पष्ट वर्णन है।
वासनाओं का शरीर — मृत्यु के बाद जीव अपनी संचित वासनाओं, इच्छाओं और संस्कारों के साथ शरीर त्यागता है। यही वासनाएँ एक सूक्ष्म देह का रूप ले लेती हैं। गरुड़ पुराण में इसे 'वासनामय शरीर' कहा गया है।
कर्म के फल का भोग — जब तक कर्म का फल पूरी तरह भोगा न जाए, नया स्थूल शरीर नहीं मिलता। इस बीच सूक्ष्म शरीर में रहकर ही जीव अपने कर्म-फल का अनुभव करता है।
यातना-शरीर की आवश्यकता — गरुड़ पुराण में बताया गया है कि यमलोक में जीव को यातना भोगने के लिए एक शरीर चाहिए। पिंडदान से यह 'हस्तमात्र' (एक हाथ के बराबर) यातना-शरीर बनता है — 'हस्तमात्रः पुमान् येन पथि भुंक्ते शुभाशुभं।'
संसार से अलगाव का चरण — सूक्ष्म शरीर उस संक्रमण-अवस्था का माध्यम है जब जीव एक शरीर छोड़ चुका है और दूसरा अभी नहीं मिला। यह अवस्था कर्म-न्याय की पूर्णता का इंतजार करती है।
संस्कारों की आवश्यकता — उचित पिंडदान और श्राद्ध के बाद ही जीव इस सूक्ष्म शरीर से मुक्त होकर अगली योनि प्राप्त करता है।





