विस्तृत उत्तर
राजा प्रतापभानु एक अत्यन्त प्रतापी, धर्मात्मा और चक्रवर्ती राजा थे। उन्होंने अपने भुजबल से सातों द्वीपों (सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डल) को अपने वश में कर लिया था।
चौपाई — 'सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हे। सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला॥'
इसका अर्थ — अपनी भुजाओंके बलसे उसने सातों द्वीपों (भूमिखण्डों) को वशमें कर लिया और राजाओंसे दण्ड (कर) ले-लेकर उन्हें छोड़ दिया। सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डलका उस समय प्रतापभानु ही एकमात्र (चक्रवर्ती) राजा था।
उनके मन्त्री का नाम धर्मरुचि था जो शुक्राचार्य के समान बुद्धिमान् था। उनका भाई भी बड़ा बलवान् और वीर था। प्रजा सब दुखोंसे रहित और सुखी थी।
प्रतापभानु का पूर्वजन्म रामावतार की कथा से सीधा जुड़ता है — ब्राह्मणों के शाप से वे अगले जन्म में रावण बने।





