विस्तृत उत्तर
सच्ची भक्ति वह है जिसमें कोई शर्त नहीं, कोई मांग नहीं — केवल प्रेम है।
भागवत पुराण में नवधा भक्ति बताई गई है — श्रवण (कथा सुनना), कीर्तन (नाम गाना), स्मरण (याद करना), पादसेवन (चरण सेवा), अर्चन (पूजा), वंदन (प्रणाम), दास्य (सेवक भाव), सख्य (मित्र भाव), आत्मनिवेदन (पूर्ण समर्पण)। इनमें से कोई एक भी पूर्ण हो तो भक्ति सिद्ध।
सच्ची भक्ति की पहचान: भगवान से कुछ मांगना नहीं बल्कि जो मिले उसमें कृतज्ञ होना। सुख में भी भगवान और दुख में भी भगवान। दिखावा नहीं — अकेले में भी वही भाव। दूसरों की सेवा में भगवान देखना।
मीरा, हनुमान, सूरदास, प्रह्लाद — सच्ची भक्ति के उदाहरण। गीता 7.17 — 'ज्ञानी भक्त मुझे सबसे प्रिय।' परंतु सरल प्रेमी भक्त भी उतने ही प्रिय — गीता 12.13-14।





