विस्तृत उत्तर
हिंदू धर्म में मूर्ति पूजा का गहरा शास्त्रीय और दार्शनिक आधार है।
गीता 13.28 में कृष्ण कहते हैं — 'सर्वभूतेषु यः पश्यति' अर्थात भगवान सभी प्राणियों और वस्तुओं में विद्यमान हैं। जब भगवान सर्वव्यापी हैं तो मूर्ति में भी हैं। प्राण प्रतिष्ठा संस्कार के बाद वैदिक मंत्रों से देवता की चेतना को मूर्ति में आवाहित किया जाता है — यह शास्त्रीय विधि है।
आगम शास्त्र (मंदिर निर्माण और पूजा विधि ग्रंथ) में मूर्ति प्रतिष्ठा की विस्तृत विधि दी गई है। भागवत पुराण में कहा गया है कि भगवान अर्चा (मूर्ति) रूप में भक्त के लिए प्रकट होते हैं — यह उनकी कृपा है कि निराकार ने साकार रूप लिया ताकि भक्त प्रेम कर सके।
मूर्ति भगवान नहीं, भगवान का प्रतीक है — जैसे फोटो व्यक्ति नहीं पर उसे देखकर प्रेम जागता है। भक्ति भाव से मूर्ति में भगवान जीवंत हो उठते हैं।





