विस्तृत उत्तर
जरूरी नहीं — पर सहायक।
पुरोहित से लाभ: शुद्ध मंत्रोच्चार (वैदिक मंत्र कठिन), विधि-विधान ज्ञान, संकल्प सही तरीके, स्थानीय परंपरा ज्ञात।
बिना पुरोहित: गीता (9.26) — *'पत्रं पुष्पं फलं तोयं'* — भगवान भाव देखते, माध्यम नहीं। स्वयं सच्ची प्रार्थना = पुरोहित सहित दिखावा पूजा से अधिक। स्वयं स्नान → दर्शन → मंत्र जप → प्रार्थना = पूर्ण।
⚠️ सावधानी: कई तीर्थों पर पंडा/पुरोहित = ज़बरदस्ती, अत्यधिक दक्षिणा, भय दिखाना — इनसे बचें। 'पूजा नहीं करवाओगे तो अशुभ' = गलत। भगवान से सीधा संवाद = हर भक्त का अधिकार।
संतुलित: विशेष अनुष्ठान (श्राद्ध/पिंडदान) = पुरोहित उचित। सामान्य दर्शन = स्वयं पर्याप्त।




