विस्तृत उत्तर
भागवत कथा के लिये तीर्थ, वन और घर तीनों स्थान स्वीकार बताए गए हैं। जहाँ कथा हो, वहाँ विस्तृत स्थान होना चाहिए ताकि श्रोता, वक्ता और आने वाले अतिथि आराम से बैठ सकें। भूमि का शोधन, मार्जन और लेपन करके उसे पवित्र किया जाता है। घर में कथा हो तो घर की सामग्री एक कोने में रखकर स्थान खाली किया जाता है। पाँच दिन पहले बिछाने की वस्तुएँ जुटाकर केले के खंभों वाला मंडप बनाया जाता है। फल, फूल, पत्ते, चंदोवे और ध्वजाओं से मंडप सजाया जाता है। इस निर्देश से कथा का स्थान केवल सुविधा की दृष्टि से नहीं, बल्कि पवित्रता, विस्तार और श्रद्धापूर्ण सज्जा के आधार पर चुना जाता है।
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