विस्तृत उत्तर
यह प्रश्न सदियों से विद्वानों के बीच चर्चा का विषय रहा है। दोनों पक्ष:
कर्मकांड पक्ष — पूजा विधि, मंत्रोच्चारण, हवन, अनुष्ठान एक अनुशासन देते हैं जो मन को भटकने नहीं देता। शुरुआती भक्तों को कर्मकांड ढांचा (structure) प्रदान करता है। वैदिक परंपरा कर्मकांड पर आधारित है।
प्रेम पक्ष — गीता 9.26 में कृष्ण ने पत्ता-फूल-जल भी भाव से स्वीकार किया। मीरा ने कोई विधि नहीं निभाई, केवल प्रेम। कबीर ने कहा 'पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय; ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।' प्रेम बिना कर्मकांड खोखला है।
संतुलित सत्य — शुरुआत कर्मकांड से करें (अनुशासन), परंतु लक्ष्य प्रेम है। कर्मकांड सीढ़ी है, प्रेम मंजिल। सीढ़ी जरूरी है पर सीढ़ी पर ही बैठे रहना उचित नहीं। जब प्रेम जागे तो कर्मकांड स्वतः सरल हो जाता है।





