विस्तृत उत्तर
सीताजी ने जयमाला पहनाते समय अत्यन्त सकुचाहट, प्रेम और आनन्द का अनुभव किया। गुरुजनों की लाज, बड़े समाज की उपस्थिति और लोक-मर्यादा से वे सकुचा रही थीं — पर हृदय में अपार प्रेम और हर्ष था।
चौपाई — 'सकुची व्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी। तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चित राचा॥'
अर्थ — सकुचाहट और व्याकुलता बड़ी जानकर उन्होंने धीरज धरा और हृदयमें विश्वास लाया (कि पार्वतीजी का वरदान सत्य है)। (मन में कहा —) मेरा तन, मन, वचनका प्रण (व्रत) सच्चा है और मेरा चित्त श्रीरघुपतिके चरणकमलोंमें अनुरक्त है।
यह सीताजी के अन्तर्मन का भाव है — बाहर से सकुचाहट, भीतर से दृढ़ प्रेम और विश्वास।





