विस्तृत उत्तर
आचमन का अर्थ है मंत्रोच्चारण के साथ पवित्र जल को तीन बार ग्रहण करना। यह पूजा, यज्ञ या किसी भी धार्मिक कार्य के आरम्भ में शरीर, मन और हृदय की शुद्धि के लिए किया जाता है। सनातन परम्परा में बिना आचमन के कोई भी पूजन अधूरा माना जाता है।
आचमन की सामान्य वैदिक विधि में दाहिने हाथ में आचमनी से तीन बार जल लेकर निम्न मंत्र बोलते हुए जल ग्रहण किया जाता है:
प्रथम आचमन: ॐ केशवाय नमः
द्वितीय आचमन: ॐ नारायणाय नमः
तृतीय आचमन: ॐ माधवाय नमः
इसके बाद अंगूठे से होंठ पोंछते हुए: ॐ गोविंदाय नमः कहकर हाथ धो लें।
इसके पूर्व पवित्रीकरण के लिए जल छिड़कते हुए यह मंत्र बोला जाता है:
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
इस मंत्र का अर्थ है — चाहे मनुष्य पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में हो, यदि वह कमलनयन भगवान विष्णु का स्मरण करे तो वह भीतर और बाहर दोनों से शुद्ध हो जाता है।
आचमन करते समय मुख उत्तर या पूर्व दिशा में होना चाहिए। जल इतना ही ग्रहण करें जो हृदय तक पहुँच जाए। मनुस्मृति और अन्य धर्मग्रंथों में आचमन की इस परम्परा का विस्तार से वर्णन है।





