विस्तृत उत्तर
सगोत्र विवाह वर्जित होने के पीछे शास्त्रीय, वैज्ञानिक और सामाजिक — तीनों प्रकार के कारण हैं।
शास्त्रीय कारण यह है कि एक ही गोत्र के सभी व्यक्ति एक ही ऋषि के वंशज माने जाते हैं। इस कारण उनके आपस में भाई-बहन जैसा सम्बंध होता है। मनुस्मृति के अनुसार सात पीढ़ियों तक एक पुरुष का रक्त अगली पीढ़ियों में रहता है। इसलिए उसी गोत्र में विवाह करना अनाचार माना गया है, जो धर्मशास्त्र और समाज दोनों को अस्वीकार्य है।
आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों इस तथ्य को मान्यता देते हैं। एक ही वंश में विवाह करने से संतान में अनुवांशिक दोष आने की संभावना अत्यधिक बढ़ जाती है। वंशानुगत बीमारियाँ, रोग प्रतिरोधक क्षमता का कमजोर होना और शारीरिक विकृतियाँ हो सकती हैं।
सामाजिक कारण यह है कि एक ही गोत्र के लोग परिवार की तरह रहते आए हैं। उनके बीच विवाह करना परिवार की एकता को भंग करता है और सामाजिक व्यवस्था को बाधित करता है।
इसके अतिरिक्त, विवाह में तीन पीढ़ियों तक कोई भी गोत्र समान नहीं होना चाहिए — अर्थात पिता, माता और दादी तीनों के गोत्र अलग होने चाहिए, तभी विवाह शास्त्रसम्मत माना जाता है।





