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विस्तृत उत्तर
मैत्राक्षज्योतिक वह प्रेत है जो वैश्य के धर्म से च्युत होने पर प्राप्त होता है। मनुस्मृति के अनुसार, छल-कपट से व्यापार, अनुचित धन संचय और धर्म से च्युत होना वैश्य को मैत्राक्षज्योतिक प्रेत बनाता है। यह प्रेत मवाद खाने वाला होता है। मेधातिथि के अनुसार यह पिशाच की ही एक प्रजाति है। कुछ आचार्यों के अनुसार इसका अर्थ है वह जिसके मल-द्वार से प्रकाश निकलता हो या जो उल्लू के समान सूर्य के प्रकाश में दृष्टिहीन हो।
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