विस्तृत उत्तर
प्रायश्चित का संधि-विच्छेद करें — 'प्रायः + चित्त' — अर्थात जिससे चित्त शुद्ध हो, जिससे मन परिवर्तित हो। धार्मिक दृष्टि से प्रायश्चित वह क्रिया है जो पाप कर्म के दुष्प्रभाव को न्यून करने और चित्त को पुनः शुद्ध बनाने के लिए की जाती है।
शास्त्रों में बताया गया है कि प्रायश्चित दो प्रकार का होता है — एक वह जो अनजाने में हुए पापों के लिए, जैसे नित्यकर्म, स्नान-संध्या, पूजन-अर्चन, जप और उपवास; दूसरा वह जो जानबूझकर किए गए पापों के लिए, जिसमें तपस्या, दान, तीर्थ, यज्ञ और शरणागति शामिल हैं।
मनुस्मृति के अनुसार पाप करने वाला व्यक्ति सच्चा पश्चाताप करके, अपना पाप प्रकट करके, सद्ग्रंथों के अध्ययन से और तपश्चर्या से पाप से मुक्त हो सकता है। भविष्य में पाप न करने का दृढ़ संकल्प ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है।
प्रायश्चित और पश्चाताप में अंतर — पश्चाताप एक आंतरिक मनोदशा है, जबकि प्रायश्चित उस मनोदशा के बाद किया जाने वाला बाहरी कर्म है। केवल अनुष्ठान से पाप नहीं कटता जब तक मन में सच्चा परिवर्तन न हो।
यह भी ध्यान रखें — पाप का फल भोगना ही पड़ता है; प्रायश्चित उसे पूरी तरह मिटाता नहीं, किंतु भविष्य के पाप से बचाता है और आत्मा को परिशुद्ध करने में सहायक होता है।





