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विस्तृत उत्तर
मनुस्मृति के अध्याय ३, श्लोक २८४ में वसु-रुद्र-आदित्य पितृ वर्गीकरण का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। महर्षि मनु कहते हैं: 'वसून् वदन्ति तु पितॄन् रुद्रांश्चैव पितामहान् । प्रपितामहांस्तथाऽदित्यान् श्रुतिरेषा सनातनी ॥' इसका अर्थ है कि विद्वान पिता तथा निकटतम पितरों को वसु रूप मानते हैं, पितामहों को रुद्र रूप कहते हैं और प्रपितामहों को आदित्य रूप बताते हैं। यह कोई नई कल्पना नहीं है, बल्कि वेद की सनातन श्रुति है।
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