विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में श्राद्ध की प्रक्रिया में ब्राह्मणों की भूमिका अनिवार्य और अत्यंत महत्वपूर्ण बताई गई है।
पितरों का प्रतिनिधित्व — श्राद्ध में ब्राह्मण पितरों का प्रतिनिधि माना जाता है। उन्हें जो भोजन और दान दिया जाता है, वह सूक्ष्म रूप में पितरों और प्रेत तक पहुँचता है। 'ब्राह्मण भोजन = पितर तृप्ति' — यह श्राद्ध का मूल सिद्धांत है।
मंत्रोच्चार और विधि — ब्राह्मण आचार्य श्राद्ध की विधि संचालित करता है, संकल्प करवाता है और पितृ-मंत्रों का उच्चारण करता है। बिना ब्राह्मण के श्राद्ध की विधि पूर्ण नहीं होती।
दान का माध्यम — गरुड़ पुराण के तेरहवें अध्याय में — 'विविध प्रकार के सुस्वादु मिष्टान्नों से ब्राह्मणों को भोजन कराएँ और फिर दक्षिणा सहित अन्न एवं जलयुक्त बारह घट प्रदान करें।' ब्राह्मण इस दान के पात्र हैं।
शुद्धि — गरुड़ पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध के बाद ब्राह्मणों को अपनी वर्ण के अनुसार जल, शस्त्र, कोड़े या डंडे का स्पर्श करके शुद्धि करनी चाहिए।
आशीर्वाद — श्राद्ध के अंत में ब्राह्मणों से आशीर्वाद लेना चाहिए। उनका आशीर्वाद पितरों का आशीर्वाद माना जाता है।
गरुड़ पुराण के ग्यारहवें अध्याय में — 'दस दिन तक एक ब्राह्मण को प्रतिदिन मिष्टान्न भोजन कराना चाहिए।'





