विस्तृत उत्तर
सूक्ष्म शरीर का उपयोग जीवात्मा की यात्रा को संभव बनाने के लिए होता है। इसके बिना जीवात्मा न यमलोक जा सकती है, न कर्मफल भोग सकती है और न नया जन्म ले सकती है। यह सूक्ष्म शरीर आत्मा और अगले स्थूल शरीर के बीच सेतु का काम करता है।
वेदांत दर्शन के अनुसार सूक्ष्म शरीर तीन महत्वपूर्ण कार्य करता है — पहला, यह कर्मों के बीज (संस्कार) को एक जन्म से दूसरे जन्म तक सुरक्षित ले जाता है। दूसरा, इसके माध्यम से जीवात्मा को स्वर्ग-नरक में सुख-दुःख का अनुभव होता है। तीसरा, नए स्थूल शरीर में प्रवेश के समय यही सूक्ष्म शरीर उस शरीर को चेतन बनाता है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण इसे उस वायु की उपमा से समझाते हैं जो फूलों की सुगंध एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती है — वैसे ही सूक्ष्म शरीर जीवात्मा की पहचान, उसके संस्कार और उसकी वासनाओं को एक जन्म से दूसरे जन्म तक स्थानांतरित करता है।
इसीलिए जब तक मोक्ष नहीं मिलता, सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व बना रहता है। मोक्ष पर यह भी विसर्जित हो जाता है।





