विस्तृत उत्तर
शिवजी ने पार्वतीजी को श्रीहरि (भगवान राम) के सुन्दर चरित्र — अर्थात् रामावतार की सम्पूर्ण कथा — सुनाने का निर्णय लिया।
चौपाई — 'सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए। हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥'
इसका अर्थ — हे पार्वती! सुनो, वेद-शास्त्रोंने श्रीहरिके सुन्दर, विस्तृत और निर्मल चरित्रोंका गान किया है। हरिका अवतार जिस कारणसे होता है, वह कारण 'बस यही है' ऐसा नहीं कहा जा सकता (अनेकों कारण हो सकते हैं)।
आगे शिवजी ने कहा — 'राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी। तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना॥'
अर्थ — हे सयानी! सुनो, हमारा मत तो यह है कि बुद्धि, मन और वाणीसे श्रीरामचन्द्रजीकी तर्कना नहीं की जा सकती। तथापि संत, मुनि, वेद और पुराण — अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार जैसा कुछ कहते हैं (वही मैं तुमको सुनाता हूँ)।
यहीं से रामावतार के कारणों और फिर सम्पूर्ण रामकथा का आरम्भ होता है।





