विस्तृत उत्तर
ताड़का एक भयानक राक्षसी थी जो विश्वामित्रजी के यज्ञ क्षेत्र के मार्ग में रहती थी। बालकाण्ड में उसका वर्णन संक्षिप्त है।
चौपाई — 'चले जात मुनि दीन्हि देखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई। एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥'
अर्थ — मार्गमें चले जाते हुए मुनिने ताड़काको दिखलाया। शब्द सुनते ही वह क्रोध करके दौड़ी। श्रीरामजीने एक ही बाणसे उसके प्राण हर लिये और दीन जानकर उसको निजपद (अपना दिव्य स्वरूप/मुक्ति) दिया।
ताड़का सुकेतु यक्ष की कन्या थी। वाल्मीकि रामायण में उसका विस्तृत वर्णन है — वह शापवश राक्षसी बनी थी और विश्वामित्रजी के आश्रम के निकट वन में रहकर यज्ञ में विघ्न डालती थी।



