विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण और शंखलिखित स्मृति में वैतरणी नदी की दुर्गंध का उल्लेख उसकी भयावहता के एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में मिलता है।
शास्त्रीय वर्णन — गरुड़ पुराण में वैतरणी को 'दुर्गंधपूर्ण' नदी कहा गया है। इसमें बहने वाले रक्त, मांस, मवाद, मल-मूत्र, चर्बी और सड़े-गले पदार्थों से यह नदी इतनी दुर्गंधमय है कि उसके समीप आते ही पापी जीव का मन और भी व्याकुल हो जाता है।
केशरूपी सेवार — गरुड़ पुराण के द्वितीय अध्याय में कहा गया है कि यह नदी 'केशरूपी सेवार से भरी है।' सड़ी घास और काई जैसी वनस्पतियों से भरी नदी — जो स्वयं ही दुर्गंध का स्रोत है।
दुर्गंध का प्रतीकात्मक अर्थ — यह दुर्गंध उन पापी जीवों के चरित्र की बदबू का प्रतीक है। जिसने जीवन में दूसरों के जीवन को दुर्गंधमय बनाया — धोखा दिया, झूठ बोला, हिंसा की — उसे मृत्यु के बाद यह दुर्गंधपूर्ण नदी में स्नान करना पड़ता है।
यममार्ग पर भी — वैतरणी से पहले ही यममार्ग पर मृत जानवरों के शरीर और अपवित्र स्थान मिलते हैं जिनसे दुर्गंध आती है। वैतरणी इस यातना का चरमबिंदु है।



