विस्तृत उत्तर
याज्ञवल्क्यजी और भरद्वाजजी का मिलन माघ मेले (मकर स्नान) के अवसर पर प्रयाग में हुआ।
चौपाई — 'एहि बिधि भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं। प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा॥'
अर्थ — इसी प्रकार माघके महीनेभर स्नान करते हैं और फिर सब अपने-अपने आश्रमोंको चले जाते हैं। हर साल वहाँ इसी तरह बड़ा आनन्द होता है। मकरमें स्नान करके मुनिगण चले जाते हैं।
आगे — 'एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए। जागबलिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥'
अर्थ — एक बार पूरे मकरभर स्नान करके सब मुनीश्वर अपने-अपने आश्रमोंको लौट गये। परम ज्ञानी याज्ञवल्क्य मुनिको चरण पकड़कर भरद्वाजजीने रख लिया।





