विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में यममार्ग पर जीव के बार-बार गिरने का वर्णन बहुत विस्तार से किया गया है और इसके अनेक कारण हैं।
प्रथम कारण — पापी जीव का शरीर अत्यंत दुर्बल होता है। उसने जीवन में धर्म के लिए कोई साधना नहीं की, शरीर को सांसारिक भोगों में लगाया। सूक्ष्म शरीर भी वैसा ही दुर्बल होता है जैसा संस्कार उसने अर्जित किए।
द्वितीय कारण — भूख-प्यास और गर्मी से वह इतना व्याकुल होता है कि चलने की शक्ति ही नहीं बचती। गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'थककर जगह-जगह गिरता और मूर्च्छित होता हुआ वह पुनः उठकर पापीजनों की भाँति अंधकारपूर्ण यमलोक में ले जाया जाता है।'
तृतीय कारण — यममार्ग बहुत दुर्गम है। जलती बालू, कोई सहारा नहीं, कोई छाया नहीं, कोई विश्राम नहीं। ऐसे मार्ग पर चलना असंभव-सा होता है।
चतुर्थ कारण — यमदूत उसे बलपूर्वक खींचते हैं, कोड़े मारते हैं। इस तनाव और पीड़ा के बीच जीव का बार-बार गिरना स्वाभाविक है।
पाँचवाँ कारण — यह पाप के बोझ का प्रतीक है। जिसने जीवन में धर्म का भार नहीं उठाया, वह मृत्यु के बाद पाप के बोझ से बार-बार गिरता है।





