विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में यममार्ग पर जीव को अपने कर्मों की स्मृति होती है — 'अपने पापों का स्मरण करते हुए वह पीड़ित जीव यममार्ग में चलता है।' यह स्मृति कई प्रयोजनों से होती है।
पहला प्रयोजन — कर्म-बोध। यमलोक में चित्रगुप्त के समक्ष न्याय होने से पहले जीव को स्वयं अपने कर्मों का बोध होना आवश्यक है। यह स्मृति न्याय की प्रारंभिक प्रक्रिया है। जब चित्रगुप्त कर्मों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं, तो जीव उसे नकार नहीं सकता क्योंकि वह स्वयं भी उसे याद कर रहा होता है।
दूसरा प्रयोजन — पश्चाताप जगाना। यह पश्चाताप उस अंतिम मोड़ पर निरर्थक है जहाँ कुछ बदला नहीं जा सकता। परंतु यह पश्चाताप अगले जन्म में सुधार का बीज बोता है। कर्म की स्मृति और पश्चाताप संस्कार बनकर अगले जन्म में सात्विक प्रवृत्ति उत्पन्न कर सकते हैं।
तीसरा प्रयोजन — यह पाप की एक विशेष यातना है। जो व्यक्ति जीवन में पछतावे के बिना पाप करता रहा, वह मृत्यु के बाद यात्रा के हर कदम पर पछताता है। यह उस व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा है।
इसीलिए शास्त्र कहते हैं — जीवन में ही पछताओ और सुधरो; मृत्यु के बाद का पछतावा व्यर्थ है।





