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लोक प्रश्नोत्तरी — 3617 प्रश्न

शास्त्रों और पुराणों पर आधारित लोक विषय के प्रामाणिक प्रश्न-उत्तर — कुल 3617 प्रश्न

लोक

सुधर्मा सभा में कौन-कौन होते हैं?

सुधर्मा सभा में इन्द्र-शची के अलावा सिद्ध, साध्य, महर्षि पराशर, दुर्वासा, याज्ञवल्क्य, व्यासदेव, बृहस्पति, शुक्राचार्य और तुम्बुरु जैसे महान जन उपस्थित रहते हैं।

सुधर्मासदस्यऋषि
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सुधर्मा सभा कैसी दिखती है?

सुधर्मा सभा 150 योजन लंबी, 100 योजन चौड़ी और 5 योजन ऊँची है। यह सूर्य के समान प्रकाशित है और इच्छानुसार आकाश में विचरण करती है।

सुधर्माआकार150 योजन
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सुधर्मा सभा में जाने से क्या होता है?

सुधर्मा सभा में प्रवेश करते ही शोक, बुढ़ापा, थकान, चिंता और भय का पूर्णतः नाश हो जाता है। यह सभा आकाश में इच्छानुसार गति भी कर सकती है।

सुधर्माशोक मुक्तिबुढ़ापा
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इन्द्र की राजसभा का क्या नाम है?

इन्द्र की राजसभा का नाम 'सुधर्मा' है जिसे 'पुष्कर-मालिनी' भी कहते हैं। यह अमरावती के मध्य में है और स्वर्लोक का शासन यहीं से होता है।

इन्द्रराजसभासुधर्मा
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अमरावती का वातावरण कैसा है?

अमरावती में सदा वसंत जैसा मौसम है, शीतल सुगंधित वायु बहती है, गंधर्वों का मधुर संगीत गूंजता है और अंधकार कभी नहीं होता।

अमरावतीवातावरणसुगंध
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अमरावती में रात और दिन कैसे होते हैं?

अमरावती में कभी अंधकार नहीं होता। प्रकाश देवताओं के दिव्य शरीरों, स्वर्ण महलों और रत्नों की आभा से उत्पन्न होता है। तापमान सदा वसंत ऋतु जैसा रहता है।

अमरावतीरात दिनप्रकाश
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अमरावती किससे बनी है?

अमरावती विशुद्ध जाम्बूनद स्वर्ण और हीरों से बनी है। इसमें सांसारिक ईंट या पत्थर का उपयोग नहीं हुआ। महलों के खंभे ठोस हीरों से बने हैं।

अमरावतीजाम्बूनद स्वर्णहीरे
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अमरावती का निर्माण किसने किया?

अमरावती का निर्माण देवताओं के सर्वोच्च वास्तुकार विश्वकर्मा (त्वष्टा) ने किया। वे ब्रह्मा जी या कश्यप के पुत्र और देवताओं के महान शिल्पकार हैं।

अमरावतीविश्वकर्मानिर्माण
लोक

अमरावती नगरी क्या है?

अमरावती देवराज इन्द्र की राजधानी है जो 800 मील की परिधि में फैली है। इसे देवपुर और पूषाभासा भी कहते हैं। यह जाम्बूनद स्वर्ण और हीरों से बनी है।

अमरावतीइन्द्रराजधानी
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क्या मनुष्य भी स्वर्ग में रह सकते हैं?

हाँ, पुण्यात्मा मनुष्य स्वर्ग में रह सकते हैं लेकिन यह अस्थायी है। जब तक पुण्य रहें तब तक स्वर्ग का भोग होता है फिर पृथ्वी पर लौटना पड़ता है।

मनुष्यस्वर्गपुण्य
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सिद्ध और चारण कौन होते हैं?

सिद्ध अष्ट-सिद्धियों से युक्त महात्माएं हैं, चारण देवताओं की कीर्ति का गान करने वाले और विद्याधर दिव्य विद्याओं के धारक हैं।

सिद्धचारणविद्याधर
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गंधर्व और अप्सराएं कौन होती हैं?

गंधर्व स्वर्ग के दिव्य गायक और वादक हैं जबकि उर्वशी, रंभा, मेनका जैसी अप्सराएं नृत्य और सौंदर्य के लिए विख्यात हैं। ये देव-उद्यानों में विहार करते हैं।

गंधर्वअप्सराएंस्वर्ग
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33 कोटि देवता कौन-कौन से हैं?

33 कोटि देवताओं में 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्विनी कुमार हैं। इनके अतिरिक्त अग्नि, वरुण, यम, कुबेर जैसे दिक्पाल भी हैं।

33 कोटि देवताआदित्यवसु
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स्वर्लोक के अधिपति कौन हैं?

स्वर्लोक के अधिपति देवराज इन्द्र हैं जिन्होंने सौ यज्ञ (शतक्रतु) करके यह पद प्राप्त किया। वे शची सहित अमरावती में स्वर्ण-सिंहासन पर विराजते हैं।

स्वर्लोकइन्द्रअधिपति
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स्वर्ग में कौन-कौन रहता है?

स्वर्ग में 33 कोटि देवता, गंधर्व, अप्सराएं, सिद्ध, चारण, विद्याधर, महर्षि और पुण्यकर्मी मनुष्य रहते हैं।

स्वर्गनिवासीदेवता
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स्वर्लोक की ऊपरी और निचली सीमा क्या है?

स्वर्लोक की निचली सीमा सूर्यमंडल के ऊपर से और ऊपरी सीमा ध्रुवलोक तक है। सूर्य के नीचे भुवर्लोक है और ध्रुव के ऊपर महर्लोक है।

स्वर्लोकसीमासूर्य
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स्वर्लोक किसके बीच में है?

स्वर्लोक नीचे भुवर्लोक और ऊपर महर्लोक के बीच में स्थित है। यह भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत के बीच सेतु का काम करता है।

स्वर्लोकभुवर्लोकमहर्लोक
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पृथ्वी से स्वर्लोक कितनी दूरी पर है?

पृथ्वी से सूर्य तक एक लाख योजन है। सूर्य के ऊपर से स्वर्लोक शुरू होता है और ध्रुवलोक तक फैला है।

पृथ्वीस्वर्लोकदूरी
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स्वर्लोक को और किस नाम से जानते हैं?

स्वर्लोक को स्वर्ग, देवलोक, त्रिदिव, स्वः (व्याहृति में), ज्योतिर्लोक और देवपुर जैसे अनेक नामों से जाना जाता है।

स्वर्लोकनामस्वर्ग
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स्वर्लोक कहाँ स्थित है?

स्वर्लोक सूर्यमंडल से लेकर ध्रुवलोक तक का विशाल ब्रह्मांडीय क्षेत्र है। यह भूलोक के ऊपर और महर्लोक के नीचे स्थित है।

स्वर्लोकस्थानसूर्य
लोक

स्वर्लोक क्या है?

स्वर्लोक वह दिव्य सुख का क्षेत्र है जहाँ दुःख, रोग और बुढ़ापा नहीं होते। यह देवों, पुण्यात्माओं और ऋषियों का निवास है जो पुण्य कर्मों से प्राप्त होता है।

स्वर्लोकस्वर्गपरिचय
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भूलोक को 'महा-रंगमंच' क्यों कहा गया है?

भूलोक 'महा-रंगमंच' इसलिए है क्योंकि यहाँ अनगिनत जीवात्माएं अपने कर्मों का नाटक खेलती हैं। देवता भी यहाँ जन्म चाहते हैं क्योंकि केवल यहीं मोक्ष का मार्ग है।

भूलोकमहा रंगमंचजीवात्मा
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गंगा को 'विष्णुपदी' क्यों कहते हैं?

गंगा को विष्णुपदी इसलिए कहते हैं क्योंकि भगवान वामन के त्रिविक्रम स्वरूप के चरण के स्पर्श से कारण-जल गुलाबी आभा से युक्त होकर गंगा बनी। 'विष्णुपदी' = विष्णु के चरणों से उत्पन्न।

गंगाविष्णुपदीवामन अवतार
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भूलोक को ब्रह्मांड का केंद्र बिंदु क्यों कहते हैं?

भूलोक ब्रह्मांड का केंद्र बिंदु है क्योंकि सभी लोकों की यात्रा के बाद जीव यहीं लौटता है, यहीं से मोक्ष मिलता है और यहीं दुःख-सुख के मिश्रण से वैराग्य उत्पन्न होता है।

भूलोककेंद्र बिंदुकर्मभूमि

विषय-वार प्रश्नोत्तर

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सनातन धर्म प्रश्नोत्तरी — शास्त्रीय ज्ञान

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