विस्तृत उत्तर
महाभारत के अनुशासन पर्व में 'अहिंसा परमो धर्मः' वाक्य विभिन्न स्थानों पर आया है। परंतु इसका सर्वाधिक प्रसिद्ध और पूर्ण श्लोक-युग्म अनुशासन पर्व, अध्याय 115 और 116 (दानधर्मपर्व) में है।
अनुशासन पर्व 115.23 का श्लोक है:
अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं तपः।
अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥
अर्थ — अहिंसा परम धर्म है, अहिंसा परम तप है, और अहिंसा ही वह परम सत्य है जिससे धर्म की प्रवृत्ति होती है।
अनुशासन पर्व 116.28-29 के श्लोक हैं:
अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परो दमः।
अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः॥
अहिंसा परमो यज्ञस्तथाहिंसा परं फलम्।
अहिंसा परमं मित्रमहिंसा परमं सुखम्॥
अर्थ — अहिंसा परम धर्म है, परम संयम है, परम दान है, परम तप है। अहिंसा परम यज्ञ है, परम फल है, परम मित्र है और परम सुख है।
एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 'अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च' — यह अर्धश्लोक जैसा प्रचलित कथन महाभारत के किसी प्रामाणिक संस्करण में इस रूप में नहीं मिलता। शास्त्राध्येताओं ने इसे लेकर स्पष्ट किया है कि महाभारत में हिंसा को धर्म के समतुल्य नहीं रखा गया। आदिपर्व (11.12-13) में भी स्पष्ट उल्लेख है — 'अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वर' — समस्त प्राणधारियों में अहिंसा ही परम धर्म है।





