विस्तृत उत्तर
मंत्र जप में बाह्य शुद्धि (स्नान) और आंतरिक शुद्धि (पवित्र भाव) दोनों का महत्व है। शास्त्रीय नियम के अनुसार, किसी भी देवता के विशेष मंत्र या अनुष्ठान के लिए स्नान करना अनिवार्य है। लेकिन, 'भगवान के नाम' (जैसे सीताराम, हरिवंश) के लिए स्नान की कोई अनिवार्यता नहीं है। पद्म पुराण में कहा गया है कि अपवित्र हो या पवित्र, जो भगवान पुंडरीकाक्ष का स्मरण करता है, वह बाहर और भीतर से शुद्ध हो जाता है। इसलिए, शारीरिक अस्वस्थता की स्थिति में बिना नहाए भी मानसिक रूप से जप किया जा सकता है, पर सामान्य स्थिति में शुद्धता का पालन करना श्रेष्ठ है।





