विस्तृत उत्तर
गोस्वामी तुलसीदासजी के गुरु बाबा नरहरिदास (नरहर्यानन्द) माने जाते हैं। कुछ परम्पराओं में उन्हें नरहरि दास या नरसिंह दास भी कहा जाता है।
रामचरितमानस में तुलसीदासजी ने गुरु की महिमा विस्तार से बताई — 'बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि। महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर' — गुरु के चरणकमल की वन्दना करता हूँ, जो कृपा के समुद्र और नररूप हरि हैं, जिनके वचन महामोहरूपी अन्धकार के लिये सूर्यकिरणों के समूह हैं।
तुलसीदासजी ने गुरु की चरणरज को अमृत-मूल-चूर्ण (amrit mool churan) कहा — जो अविद्यारूपी रोगों को नष्ट करती है।




