विस्तृत उत्तर
जनक की निराशाजनक वाणी सुनकर लक्ष्मणजी को बड़ा क्रोध आया। उन्हें लगा कि जनक ने रघुकुल (सूर्यवंश) का अपमान किया — पृथ्वी को वीरविहीन कहकर।
लक्ष्मणजी ने कहा — 'सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू। जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं' — हे सूर्यकुलरूपी कमलके सूर्य! सुनिये, मैं स्वभावहीसे कहता हूँ, कुछ अभिमान करके नहीं — यदि आपकी आज्ञा पाऊँ तो ब्रह्माण्डको गेंदकी तरह उठा लूँ।
आगे — 'काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी' — कच्चे घड़ेकी तरह फोड़ डालूँ, सुमेरु पर्वतको मूलीकी तरह तोड़ सकता हूँ। आपके प्रतापकी महिमासे यह बेचारा पुराना धनुष तो क्या चीज़ है!
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