विस्तृत उत्तर
जय-विजय भगवान विष्णु के वैकुण्ठ (विष्णुलोक) के द्वारपाल थे। उन्हें सनकादि ऋषियों (सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार — ब्रह्माजी के मानसपुत्र) ने शाप दिया।
बालकाण्ड में शिवजी ने पार्वतीजी को रामावतार के कारण बताते हुए जय-विजय की कथा का संक्षिप्त उल्लेख किया है। पूरी कथा पुराणों में विस्तृत है —
सनकादि ऋषि भगवान विष्णु के दर्शन के लिये वैकुण्ठ गये। जय-विजय ने उन्हें द्वार पर रोक दिया। क्रोधित सनकादि ने उन्हें शाप दिया कि तुम दोनों विष्णुलोक से गिरकर असुर (राक्षस) योनि में जन्म लोगे।
जय-विजय ने तीन जन्म असुर रूप में लिये:
- 1हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु
- 2रावण और कुम्भकर्ण
- 3शिशुपाल और दन्तवक्र
तीनों जन्मों में भगवान ने उनका वध करके उन्हें मुक्ति दी। रामावतार में रावण और कुम्भकर्ण वस्तुतः जय-विजय ही थे।




