विस्तृत उत्तर
हाँ, गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि मृत्यु के अंतिम क्षणों में व्यक्ति को 'दिव्य दृष्टि' की प्राप्ति होती है। भगवान विष्णु गरुड़ को बताते हैं कि जब इंद्रियाँ शिथिल होती हैं और बोलने की शक्ति जाती है, उस क्षण व्यक्ति को एक विलक्षण दृष्टि मिलती है।
इस दिव्य दृष्टि में व्यक्ति — अपने पूरे जीवन को एक क्षण में देख सकता है, ब्रह्मांड की घटनाओं को एकरूप में देखता है, अपने शरीर को बाहर से देखने में सक्षम होता है और आत्मा के वास्तविक अस्तित्व का अनुभव करता है।
हालाँकि यह दिव्य दृष्टि सभी को एक समान नहीं होती। पुण्यात्मा को यह दिव्य प्रकाश, शांति और दैवीय दर्शन के रूप में मिलती है। पापी को यही दृष्टि यमदूतों के भयावह रूप और नरक के दृश्यों को दिखाती है।
कठोपनिषद में भी इस अवस्था का संकेत मिलता है जहाँ आत्मा का उस सूक्ष्म सत्य से साक्षात्कार होता है जो सामान्य जीवन में इंद्रियों के परदे में छुपा रहता है। इस दिव्य दृष्टि को ही योगशास्त्र में 'मृत्युकालीन समाधि' का एक रूप माना जा सकता है।





