विस्तृत उत्तर
सनातन शास्त्रों और गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के समय व्यक्ति को एक विशेष प्रकार की 'दिव्य दृष्टि' प्राप्त होती है। इस अवस्था में उसे अपने जीवन का, कर्मों का और सत्य का स्पष्ट बोध होता है — यह एक प्रकार का अनायास ज्ञान है जो शरीर-बंधन के शिथिल होते ही उदय होता है।
कठोपनिषद में इस विषय का सुंदर वर्णन है। जब नचिकेता यमराज से मृत्यु के रहस्य का प्रश्न करते हैं, तब यमराज बताते हैं कि मृत्यु के क्षण में आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप के निकट होती है। शरीर के बंधन ढीले होते हैं और चेतना का एक विस्तार होता है।
हालाँकि यह 'ज्ञान' एक विशेष अर्थ में है — यह आत्मज्ञान नहीं जो मोक्ष देता है, बल्कि जीवन की सच्चाई का बोध है जो उस क्षण होता है। जो व्यक्ति पूरे जीवन आत्मज्ञान की साधना करता रहा हो, उसके लिए यह क्षण मोक्ष का द्वार बन सकता है। परंतु जो व्यक्ति पूरे जीवन अज्ञान में रहा हो, उसके लिए यह क्षण केवल पछतावे और भय का होता है।
इसीलिए शास्त्र जीवन भर ज्ञान-साधना और ईश्वर-भक्ति का उपदेश देते हैं — मृत्यु के समय का यह 'ज्ञान' केवल उन्हीं के लिए फलदायी होता है जिन्होंने जीते-जी सत्य की खोज की हो।





