विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण और पुराणिक वर्णनों के अनुसार यमलोक मुख्यतः मनुष्यों के कर्मों का न्याय करने का स्थान है। सभी प्राणियों का यमलोक जाना शास्त्रों में स्पष्ट रूप से वर्णित नहीं है।
सनातन दर्शन के अनुसार पशु, पक्षी, कीट और अन्य जीव 'भोग योनि' में होते हैं — अर्थात् वे केवल अपने पूर्व कर्मों का फल भोगने के लिए उस योनि में जन्मे हैं, उनके पास स्वतंत्र विवेक और नए कर्म करने की क्षमता बहुत सीमित होती है। इसीलिए उनके लिए यमराज द्वारा कर्मों का विशेष लेखा-जोखा करने का वर्णन उतना नहीं मिलता।
मनुष्य अकेला ऐसा प्राणी है जिसके पास पूर्ण विवेक-बुद्धि है, जो धर्म-अधर्म का भेद जान सकता है और जानबूझकर कर्म करता है। इसीलिए मनुष्य के कर्मों का न्याय यमलोक में होता है।
हालाँकि कुछ पुराणों में ऐसे प्रसंग भी मिलते हैं जहाँ पशुओं को भी दिव्य गति मिली है — जैसे गजेंद्र (हाथी) को भगवान विष्णु ने मोक्ष दिया। परंतु ऐसे उदाहरण विशेष भक्ति या दिव्य कृपा के कारण हैं, नियम नहीं।
सारांशतः, यमलोक का विधान मुख्यतः मनुष्यों के लिए है। अन्य प्राणियों की गति उनके पूर्व कर्मों और परिस्थितियों पर निर्भर करती है।





