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जीवन एवं मृत्यु⏱ 2 मिनट पठन

मृत्यु के समय किए गए दान का क्या विशेष महत्व है?

गरुड़ पुराण में मृत्युकाल के दान का फल हजार गुना है। 'दान रूपी पाथेय से यममार्ग सुखद होता है।

संक्षिप्त उत्तर

गरुड़ पुराण में मृत्युकाल के दान का फल हजार गुना है। 'दान रूपी पाथेय से यममार्ग सुखद होता है।' अष्टमहादान (तिल, स्वर्ण, नमक, सप्तधान्य, जलपात्र, लोहा, रुई, भूमि, पादुका) अन्तकाल में अवश्य देने चाहिए।

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विस्तृत उत्तर

गरुड़ पुराण के आठवें अध्याय में मृत्यु के समय किए जाने वाले दान का अत्यंत विस्तृत और महत्वपूर्ण वर्णन है।

हजार गुना फल — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'स्वस्थचित्तावस्था में दी गई एक गौ, आतुरावस्था में दी गई सौ गाय और मृत्युकाल में दी गई एक हजार गाय तथा मरणोत्तर काल में दी गई एक लाख गाय के दान का फल बराबर होता है।' यह मृत्युकाल के दान की असाधारण महत्ता को दर्शाता है।

आतुरकाल विशेष — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'आतुरकाल और ग्रहणकाल — इन दोनों कालों में दिये गये दान का विशेष महत्व है, इसलिए तिल आदि अष्ट दान अवश्य देने चाहिए।'

कर्म का साथी — गरुड़ पुराण में यह भी कहा गया है — 'दान रूपी पाथेय को लेकर जीव परलोक के महामार्ग में सुखपूर्वक जाता है, अन्यथा दानरूपी पाथेय रहित प्राणी को यममार्ग में क्लेश प्राप्त होता है।' मृत्युकाल का दान यही 'पाथेय' (रास्ते का भोजन) है।

पुत्र का कर्तव्य — 'सत्पुत्र को चाहिए कि अन्तकाल में सभी प्रकार का दान दिलाए।' — यह गरुड़ पुराण का सीधा निर्देश है।

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