विस्तृत उत्तर
लक्ष्मणजी ने परशुरामजी से अत्यन्त निर्भीकता और व्यंग्य से बात की। उन्होंने कहा — (1) 'बहु धनुही तोरी लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं' — बचपन में बहुत धनुष तोड़े, कभी ऐसा क्रोध नहीं हुआ। (2) 'कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं' — आज्ञा हो तो ब्रह्माण्ड गेंद-सा उठा लूँ। (3) 'काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी' — कच्चे घड़े-सा फोड़ दूँ, मेरु को मूली-सा तोड़ दूँ।
फिर कहा — 'लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल। जेहि बस जनअनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल' — हे मुनि! क्रोध पापका मूल है, जिसके वश होकर मनुष्य अनुचित कर्म करते हैं।
परशुरामजी क्रोध से जल रहे थे पर लक्ष्मणजी निर्भय रहे — 'भृगुपति सुनि सुनि निर्भय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी' — लक्ष्मणजी की निर्भय वाणी सुन-सुनकर परशुरामजी क्रोध से जल रहे थे और उनके बल की हानि हो रही थी।





