विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में पिंडदान और प्रेत की भूख-तृप्ति के संबंध का अत्यंत सुंदर और गहरा वर्णन है।
पिंड प्रेत का भोजन — गरुड़ पुराण में स्पष्ट कहा गया है कि मृत्यु के बाद के दस दिनों में परिजनों द्वारा दिया गया प्रत्येक पिंड प्रेत के लिए भोजन का कार्य करता है। यम मार्ग पर भूख-प्यास की अत्यंत तीव्र पीड़ा होती है — पिंड यह कुछ कम करता है।
सूक्ष्म अंश की तृप्ति — पिंड में मिश्रित अन्न, जल, तिल और फूलों का सूक्ष्म अंश प्रेत की यातना-देह तक पहुँचता है। जिस प्रकार धूप का धुआँ स्थूल स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचता है, उसी प्रकार पिंड का पोषक-सार प्रेत तक जाता है।
भूख का स्वरूप — गरुड़ पुराण में बताया गया है कि प्रेत की भूख वास्तव में उसकी वासनाओं और संस्कारों की भूख है। पिंडदान यह वासना-भूख कम करता है।
कर्मकांड विधि की पुष्टि — गरुड़ पुराण में कहा गया है — 'अशौच में भी प्रेत को यात्रा-श्रम-क्षुधा-तृष्णा-ताप आदि निवारण के लिए जल, पिंडादि प्रदान किए जाते हैं।'
इस प्रकार पिंडदान प्रेत की भूख को उसी सूक्ष्म स्तर पर शांत करता है जिस स्तर पर वह भूख अनुभव करता है।





