विस्तृत उत्तर
मूर्ति की दिशा का नियम धर्म सिंधु और वास्तु शास्त्र में वर्णित है:
मूर्ति का मुख
- ▸पूर्वाभिमुख — सर्वश्रेष्ठ; सूर्य की दिशा
- ▸पश्चिमाभिमुख — दूसरा विकल्प
पूजक की दिशा
- ▸मूर्ति पूर्वाभिमुख हो तो पूजक पश्चिम में बैठे — पूर्व मुख
- ▸मूर्ति पश्चिमाभिमुख हो तो पूजक पूर्व में — पश्चिम मुख
वास्तु शास्त्र
- ▸ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में मंदिर — मूर्ति का मुख दक्षिण या पश्चिम
- ▸नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) में मंदिर न बनाएं
देवता अनुसार
- ▸सभी सामान्य देव — पूर्वाभिमुख
- ▸गणेश — पूर्व या उत्तर
- ▸शनि — पश्चिम
धर्म सिंधु
मूर्तेः पूर्वाभिमुखत्वं उत्तमम्।' — मूर्ति का पूर्वाभिमुख होना उत्तम।





