विस्तृत उत्तर
प्रतापभानु एक बार शिकार करते हुए एक सूअर का पीछा करते-करते गहरे वन में भटक गये। सूअर पहाड़ की गहरी गुफा में घुस गया और राजा बिना पानी के थके-हारे भटकते रहे।
दोहा — 'खेद खिन्न छुधित तृषित राजा बाजि समेत। खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत॥'
इसका अर्थ — बहुत परिश्रम करनेसे थका हुआ और घोड़ेसमेत भूख-प्यास से व्याकुल राजा नदी-तालाब खोजता-खोजता पानी बिना बेहाल हो गया।
इसी भटकाव में उन्हें एक आश्रम दिखा जहाँ एक कपटमुनि (कालकेतु — जो वास्तव में एक पराजित राजा था) तपस्वी वेष में रहता था। यहीं से प्रतापभानु के पतन की कथा शुरू होती है।
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