विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म में 'प्रेत' शब्द का विशिष्ट अर्थ है और यह 'भूत' से भिन्न है।
व्युत्पत्ति — 'प्रेत' शब्द संस्कृत के 'प्र + इत' से बना है। 'प्र' का अर्थ है 'आगे' और 'इत' का अर्थ है 'गया हुआ।' इस प्रकार 'प्रेत' का शाब्दिक अर्थ है — 'जो आगे गया हो' अर्थात् मृत व्यक्ति।
व्यापक अर्थ — प्रेत का व्यापक अर्थ है वह आत्मा जो शरीर छोड़ने के बाद अगली गति (पुनर्जन्म या मोक्ष) तक की संक्रमण-अवस्था में है। मृत्यु के बाद यमलोक की यात्रा पूरी करने से पहले तक आत्मा 'प्रेत' कहलाती है।
विशेष अर्थ — विशेष रूप से वह आत्मा जो अकाल मृत्यु, अधूरे संस्कारों या मोह के कारण सामान्य गति नहीं पा सकी और मृत्युलोक में भटक रही है — उसे भी 'प्रेत' कहते हैं।
गरुड़ पुराण में — प्रेतकल्प में 'प्रेत' शब्द का प्रयोग उस जीव के लिए हुआ है जो मृत्यु के बाद श्राद्ध-पिंडदान आदि संस्कारों की प्रतीक्षा में है। पिंडदान मिलने पर वह प्रेत-अवस्था से मुक्त होता है।





