विस्तृत उत्तर
वेदों में शिव का मूल नाम 'रुद्र' है। ऋग्वेद से लेकर यजुर्वेद के रुद्रम् तक — शिव का यह नाम सबसे प्राचीन और वेद-सम्मत है।
व्युत्पत्ति — 'रुद्र' की व्युत्पत्ति के दो प्रमुख मत हैं।
पहला मत: 'रुत्' = दुख/रुदन + 'द्र' = द्रावयति (हरने वाला)। अर्थात जो दुखों को हर ले, रुलाने वाले दुखों को दूर करे — वह रुद्र है। Patrika के अनुसार — 'भगवान शिव को रुद्र नाम से जाना जाता है, रुद्र का अर्थ है रुत् दूर करने वाला — अर्थात दुखों को हरने वाला।'
दूसरा मत: 'रु' = भयंकर/उग्र + 'द्र' = वेग से दौड़ने वाला। यानी उग्र वेग वाले देव।
रुद्र का द्वंद्वात्मक स्वरूप — रुद्र एक ओर सौम्य और कल्याणकारी हैं, दूसरी ओर उग्र और संहारक। यह द्वंद्व ही रुद्र का वास्तविक स्वरूप है। रुद्राष्टाध्यायी में रुद्र देवता को सर्वव्यापी और सर्वान्तर्यामी बताया गया है।
रुद्रम् — यजुर्वेद के रुद्रम् में 'नमस्ते रुद्र मन्यव' से आरंभ होकर शिव के विभिन्न रूपों का स्तवन है।





